Advertisement

Rani Kamalapati- भोपाल की महारानी जिसके नाम पर भोपाल के एक रेलवे स्टेशन का नाम हबीबगंज से रानी कमलापति रखा गया।

भोपाल मध्यप्रदेश के के एक रेलवे स्टेशन का नाम हाल ही बदलकर हबीबगंज से रानी कमलापति कर दिया गया है, आख़िर कौन है रानी कमलापति जिनको मध्य प्रदेश के इतिहास मे इतनी महत्व दिया जा रहा है।



कौन थीं रानी कमलापति? 

कमलापति का जन्म सलकनपुर रियासत के राजा कृपाल सिंह सरौतिया के यहां हुआ था और उन्हे अस्त्र-सस्त्र  घुड़सवारी और युद्ध विद्या मे बहुत रुची थी , उन्हे तलवार और तीर कमान चलने मे वे महारत हासिल की थी। 

उनका विवाह 18 वीं सदी मे गिन्नौरगढ़ के राज निज़ाम शाह से हुई थी, गिन्नौरगढ़ भोपाल से एक घंटे की दूरी पर स्थित है, उस वक्त भोपाल का राजवाडा भी उन्ही के अधीन था, परन्तु आज भोपाल से अलग एक जिला सीहोर हो गया है अब गिन्नोरगढ़ सीहोर के अंतर्गत आता है। 

राजा सूराज सिंह शाह के बेटे निजाम शाह को गोंड राजवंश का सबसे रसूखदार राजा माना जाता है। उनके राज्य में 750 से भी अधिक गांव शामिल थे। निजाम शाह की सात पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें बेहद खूबसूरत और बहादुर रानी कमलापति सबसे ज्यादा पसंद थीं।

उन्होंने कमलापति से प्यार में, भोपाल में खूबसूरत ‘कमलापति महल’ बनवाया। 1989 में इस महल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपने संरक्षण में ले लिया।



भतीजे आलम शाह ने की निजाम शाह की हत्या। 

निजाम शाह का भतीजा आलम शाह उनके राज्य को हासिल करने के साथ ही, रानी कमलापतिको भी अपनाना चाहता था। आलम शाह ने कमलापति से अपने प्यार को जाहिर भी किया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया।

फिर, रानी कमलापति को हासिल करने के मकसद से आलम शाह ने एक दिन मौका देख कर राजा निज़ाम शाह को अपने यहाँ भोजन पर बुलाया और राजा के खाने में जहर मिला दिया और उनकी मौत हो गई। इसके बाद कमलापति को अहसास हुआ कि गिन्नौरगढ़ में उन्हें और उनके 12 साल के बेटे नवल शाह की जान को भी खतरा है। इसलिए वह भोपाल में अपने नाम से बनी महल कमलापति पैलेस में रहने लगीं।

रानी कमलापति ने दोस्त मोहम्मद ख़ान की सहायता से लिया बदला। 

रानी कमलापति ने गिन्नौरगढ़ भले ही छोड़ दिया, लेकिन उनके मन में अपने पति की हत्या का बदला लेने का विचार चल रहा था। लेकिन उनके पास न कोई सेना थी और न ही पैसे। 

अंत में, रानी कमलापति ने एक तंख्वाहदार मुलाजिम् यानी पैसे लेकर मदद करने वाले यानी आज के अनुसार किराये का कातिल  दोस्त मोहम्मद खान से मदद मांगी। वह कभी मुगल सेना का हिस्सा थे, लेकिन हिसाब में उलट-फेर के कारण उन्हें बाहर निकाल दिया गया था। मोहम्मद खान भोपाल से कुछ किलोमीटर दूर इस्लामनगर में अपना राज करते थे।

लेकिन, अपने वादे के मुताबिक रानी कमलापति  ने मोहम्मद खान को आलम शाह की हत्या के बदले में एक लाख मोहरें देने का वादा किया। जिसके बाद मोहम्मद खान ने आलम शाह पर धावा बोल दिया और उनकी हत्या कर दी। परन्तु उनके पास उतने पैसे नहीं थे और वह मोहम्मद खान को सिर्फ 50 हजार मोहरें दे पाईं और बाकी पैसों के बदले में उन्हें भोपाल का कुछ हिस्सा दे दिया।

मोहम्मद ख़ान के इरादे नेक नहीं थे। 

कहा जाता है कि मोहम्मद खान के इरादे ठीक नहीं थे और वह पूरे भोपाल पर कब्जा करना चाहता था। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने रानी कमलापति खूबसूरती पे मोहित होकर उनके सामने शादी का प्रस्ताव भी रखा ताकि वह पूरे गिन्नौर्गढ़ सहित पूरे भोपाल अपना कब्जा जमा सके।

14 साल के बच्चे ने दोस्त मोहम्मद ख़ान से युद्ध किया। 

दोस्त मोहम्मद ख़ान के इस नामुराद इरादे के बारे  जब रानी कमलापति के 14 साल के बेटे नवल शाह को पता चली, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और उन्होंने अपने सैनिकों के साथ मोहम्मद खान पर तुरंत हमला कर दिया परन्तु उनकी सेना कम थी और और वे खुद युद्ध विद्या की रणनीति को नही समझते थे,वे एक माहिर योध्दा सामने युद्ध मे उतर गये थे, परिणाम स्वरूप उनकी हार हुई। परन्तु 14 साल के इस बच्चे ने एक छोटी सेना से दोस्त मोहम्मद ख़ान के सैनिको के छके छुड़ा दिये, कहा जाता है की इस युद्ध मे इतना खून बहा था की वहाँ की ज़मीन खुन से लाल हो गई थी, तभी से उस जगह का नाम लालघाटी है। जो आज भोपाल का एक छोटा सा सिटी है। 

मोहम्मद खाँन ने रानी कमलापति के 14 साल के बच्चे की हत्या की। 

1723 की इस लडाई से दोस्त मोहम्मद ख़ान की सेना लगभग समाप्त हो गई थी, इसीलिए नवल शाह की हार के बाद मोहम्मद खान ने नवल शाह की हत्या कर दी, लेकिन युद्ध स्थल पर इतना खून बहा कि उसे ‘लाल घाटी’ कहा जाने लगा। फिर, रानी कमलापति ने अपनी आबरू बचाने के लिए महल के ही एक तालाब में जलसमाधि ले ली और जबतक मोहम्मद खान महल पहुंचा, सबकुछ खत्म हो चुका था। 

कुछ इतिहासकरों के अनुसार मोहम्मद खांन रानी कमलापति को अपनी बहन मानता था। 

हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मोहम्मद खान ने रानी कमलापति  को अपनी बहन मानते हुए मदद का हाथ बढ़ाया था और कमलापति ने उनकी वजह से अपनी जान नहीं दी थी। भतीजे आलम शाह से बदले के बाद, वह मोहम्मद खान की हिफाजत में रहीं।

रानी कमलापति की मौत के बाद, भोपाल में नवाबों का दौर शुरू हुआ।

जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को संरक्षण देने के साथ ही श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर करने वाली रानी कमलापति  को मध्यप्रदेश के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। साथ ही उन्हें महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण का भी प्रतीक माना जाता है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ